मन रे ! तू काहे ना धीर धरे-गाने का ओशो संन्यासी वर्ज़न

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे

जग निर्मोही, मोह ना जाने, उसका तू मोह करे

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे

इस जीवन की चढ़ती ढलती धुप को जिसने बाँधा

रंग को जिसने बिखराया और रूप को जिसने ढाला

उसे काहे ना सिमर करे?

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे

उतना ही उपकार समझ मन, जग जितना काम दिला दे

जनम मरण का मेल है सपना, ये सपना बिसरा दे

सपने में कोई क्यों रहे?

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे

जग निर्मोही, जो मोह ना जाने, उसका मोह करे

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे।