क्या कोई ऐसा घर भी हो सकता है जिसमें मृत्यु असम्भव हो?

किसी भी घर को बनाते समय कितना ही मज़बूत या लचीला बनाया जाए उसमें प्रवेश के लिए द्वार बनाया ही जाएगा। और जिस द्वार से इंसान प्रवेश कर सकता है उसी द्वार से मृत्यु भी एक दिन प्रवेश कर सकती है।

भवन बनाने की सबसे बेहतरीन टेक्नॉलोजी का उपयोग करके भी हम बस यही कह पाते हैं कि इस भवन में व्यक्ति सबसे ज़्यादा सुरक्षित है। जैसे पानी के रिसाव को नहीं रोका जा सकता और waterproof की जगह water resistant शब्द का उपयोग करना पड़ता है, ठीक वैसा ही भवन के साथ भी है।

यदि कोई ऐसा भवन बने जिसमें सिर्फ़ दरवाज़े ही दरवाज़े हों तभी यह सम्भव हो पाएगा, लेकिन तब वह दिखाई नहीं देगा। तो मनुष्य उसे खोज कैसे पाएगा क्योंकि खोजे बगैर या जाने बगैर उसे बनाना असम्भव है।

आध्यात्मिक गुरु या आत्मज्ञानी पुरुष ही एक ऐसे विकल्प के रूप में इंसान को उपलब्ध होता है, या इंसानियत को प्राप्त होता रहा है । क्योंकि वह रहता तो उसी मकान में है, लेकिन उसका एक दरवाज़ा इंसान को उसके जीवित शरीर के रूप में दिखाई भी देता है। गुरु नानक ने इसीलिए उसे नाम दिया गुरुद्वारा ।

गुरु है धरती और आकाश के मिलने के स्थान, horizon, की भाँति। हर व्यक्ति भी उसी भाँति है लेकिन उसका परिचय सिर्फ़ पृथ्वी तत्व से ही हुआ है, और जल्दबाज़ी में, प्रतियोगिता के कारण या देखा देखी में उसने अपने को पूरा जाने बगैर, भेड़ चाल में पृथ्वी तत्व का ही मकान बना लिया। और अपनी मौत का इंतज़ाम खुद ही कर लिया। फिर तरह तरह के इन्शुरन्स ले लेकर बचने का इंतज़ाम भी कर लेता है। और एक दिन… उसी मुख्य दरवाज़े से … सब इंतज़ाम उसके सामने बेमानी साबित होते हैं।

उपनिषद में कहा है कि ‘त्वम अमृत पुत्रस्य’ तो फिर वह अमरता सबको प्राप्त होती क्यों नहीं दिखती?

कबीर ने कहा है :

कबीरा इस संसार को, समझाऊँ कितनी बार।

पूँछ को पकड़े भेड़ की, उतरा चाहे पार॥

और एक दोहे में उन्होंने उपाय भी बताया है :

कथा, कीर्तन, कुल, विषय, जो छोड़े वह पाय।

क़हत कबीरा इस जगत में, नहीं और उपाय॥

सभी धर्मों में इसलिए ही किसी जीवित आत्म प्रयास से आत्म ज्ञानी पुरुष या महिला के सत्संग की इतनी महिमा है। उनके साथ रहने से कुछ समय आप हम उस भवन में कुछ समय व्यतीत कर लेते हैं जिसमें बस द्वार ही द्वार हैं। अमृत की कुछ बूँद चखने का अवसर मिल जाता है, तो सहज ही हमारा बनाया भवन से मोह ख़त्म होता जाता है और उस द्वारों के भवन की पहली ईंट रखा जाती है।

यह जानना आवश्यक है कि हम सिर्फ़ शुरुआत कर सकते हैं, प्रयत्न करते रह सकते हैं लेकिन वह पूर्ण आपने आप से होता है या अमरता की आप पर कृपा से ही होता है।

ध्यान और सत्संग यही दो रास्ते हैं जिससे उसकी सामग्री लायी जा सकती है।