ताओ है झुकने कि कला, अंतिम होने की कला और ख़ाली होने की कला

ताओ को समझने से पूर्व यह ज़रूरी है कि इसे समझा जाए: कर्मयोगियों के लिए ओशो ने कहा कि “तुम ध्यानपूर्वक कर्म करने लगो। जो भी करो, मूर्च्छा में मत करो, होशपूर्वक करो। करते समय जागे रहो”
ज्ञानयोगीयों को ओशो ने कहा “ तुम विचार में ही मिलाकर ध्यान को पी जाओ। विचार को रोको मत; विचार आए तो उसे देखो। उसमें खोओ मत; थोड़े दूर खड़े रहो, थोड़े फासले पर। शांत भाव से देखते हुए विचार को ही धीरे-धीरे तुम साक्षी-भाव को उपलब्ध हो जाओगे। विचार से ही ध्यान को जोड़ दो।”
भक्तियोगीयों को ओशो ने को कहा “आंसू तो बहें–ध्यानपूर्वक बहें। रोमांच तो हो, लेकिन ध्यानपूर्वक हो।”
लेकिन सार-सूत्र औषधि ध्यान है। ये जो भक्ति, कर्म और ज्ञान के भेद हैं, ये औषधि के भेद नहीं हैं। औषधि तो एक ही है।
जो अष्टावक्र ने कहा “सीधे ही छलांग लगा जाओ।” औषधि सीधी ही गटकी जा सकती है। वे कहते हैं, इन साधनों की भी जरूरत नहीं है।असल में औषधि की भी ज़रूरत नहीं है, placebo की तरह ध्यान को औषधि के रूप में दिया जा रहा है क्योंकि तुम्हारी माँग है कि हम क्या करें?
कबीर ने कहा ‘साधो सहज समाधि भली’ तो वह सहज ही मिलने योग्य है क्योंकि मिला ही हुआ है, बस बचपन से जवानी के बीच खो दिया है और जब मिलेगा तो लगेगा कि यहीं तो था फिर दिखता क्यों नहीं था? पहले क्यों नहीं दिखा? Lao Tzu कहते हैं, तुम भरे हुए हो इसलिए, पूरे ख़ाली हो जाओ और जैसे घाटी में बरसात का पानी अपने आप चला आता है वैसे समाधि चली आएगी। पानी रूपी कृपा तो बरस ही रही है। तुम भरे/बड़े/ज्ञानी/ताकतवर/पहाड़ हो इसलिए ही चूक रहे हो।
यह बोध ही काफ़ी है कि तुम वही हो जिसे तुम ढूँढ रहे हो. उपनिषद ने कहा तत् त्वम असि, अहम् न कर्ता असि.

इसी को लाओ त्ज़ु ने pathless path कहा है या ताओ (TAO) कहा है, या नियम कहा है।
चीनी लोग Wu-Wei-Wu कहते हैं मतलब effortless effort. मात्र बोध से सीधे छलांग लगायी जा सकती है, यह घटना एक क्षण में हो जाती है और quantum jump से व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त होता है.

ओशो का संदेश यह है कि आज के लोगों के लिए सीधी छलांग लगाकर ज्ञान को प्राप्त करना ही सर्वश्रेष्ठ है।ताओ को समझना इसलिए उपयोगी है । ‘ज़ोरबा दी बुद्धा’ कहा ऐसे सांसारिक सन्यासियों को। उन्होंने जीवन को भरपूर जी लिया है और जीवन जीकर उन्होंने बाहर की दुनिया में कोई सुख नहीं है यह अनुभव से जान लिया है। ऐसे लोगों के लिए क्वांटम जम्प ही सबसे आसन रास्ता है क्योंकि पूरे जीवन का अनुभव उनके लिए उपयोगी आधार ( foundation) बना ही हुआ है। उनको ध्यान की तीनों पद्धतियों से एक साथ गुज़ारना होगा और किसी एक का चुनाव उसकी ध्यान में सफलता से ही करना होगा । उस पर ज़्यादा ज़ोर देकर और बाक़ी को भी जब जैसा काम हो उसके अनुसार उपयोग करते हुए संसार में रहकर साधना करनी होगी । चूँकि इस मार्ग से चलकर साधना करने के लिए कोई तीर्थ उपलब्ध ही नहीं था अतः ओशो ने ओशो काम्यून, पुणे के रूप में एक तीर्थ की स्थापना की गयी ताकि एक ही रास्ते के यात्रियों/साधकों को सत्संग, मार्गदर्शन का लाभ मिल सके और राह आसान हो सके।