प्रेम, प्रथम कभी नहीं और अति कभी नहीं

लाओ त्ज़ु ने ताओ को समझने के लिए, जीवन में उतारने के लिए तीन नियम दिए हैं।

जो सबसे अंतिम होने को राज़ी है, या जो कभी प्रथम होने की दौड़ में नहीं रहा वही ताओमयी जीवन जीने का अधिकारी है। प्रेम ही जीवन का आधार हो।

ओशो के सबसे महत्वपूर्ण संदेश ‘प्रेम के ३ चरण – शरीर, मन और आत्मा या Sex, Love and Compassion’ शायद यहीं से लेकर Jesus के प्रेम संदेश को बेहतर बनाकर लोगों के जीवन में प्रयोग करके अनुभव से समझने पर आधारित होता प्रतीत होता है.

जे सुलगे ते बुझी गये, बुझे ते सुलगे नहीं। रहिमन दाहे प्रेम के,बुझी बुझी के सुलगाहिं।

चाहे शारीरिक प्रेम हो, मानसिक हो या आत्मिक हो यही प्रेम की पहचान है, यदि है तो बुझी बुझी के सुलगाहिं। फिर फिर इलूज़न सच्चा लगने लगेगा और फिर फिर आत्मा का संग मिलता रहेगा। दया बाई ने इसे कौवे उड़ाने से परिभाषित किया।

लेकिन अति करने से तात्पर्य है कि शिखर पर पहुँचकर ग़ुम हो जाना या ओझल हो जाना या एकांत में जीवन व्यतीत करना. चाहे प्रेम का कोई भी चरण हो यह ज़रूरी है क्योंकि उसका खिंचाव ज़बरदस्त है और तुम्हारा आत्मा या ताओ उस प्रेम के खिंचाव से परे है या वह प्रेम भी उसके भीतर है यह बाहर आने पर ही पता चलता है.