हक़ीरो-नातुवां तिनका

हक़ीरोनातुवां तिनका, हवा के दोष पर पर्रां।

समझता था के बहरो-बर पर उसकी हुक्मरानी है।।

मगर झोंका हवा का एक अलबेला, तलव्वुत केश बेपरवाह

जब उसके जी में आए रुख़ पलट जाए

हवा पलटी बुलंदी का फुसूँ टूटा,

हक़ीरो-नातुवां तिनका,

पाया है अपने को सबकी ख़ाक-ए-पा पर ।

ख़ुदा को जानकर इस राहगीरे बेपरवाह को, अब यह ख़्वाबे-अज़मत ही दिखाई देता है ।

एक तुच्छ और निर्बल तिनका कभी हवा पर चढ़ जाता है । वह आकाश में उड़ने लगता है । उसे हवा में उड़ते हुए यह लगता है जैसे इस नीचे दिखाई देने वाले पूरा इलाक़ा उसकी मेहरबानियों से ही मौजूद है । उसीके हुक्म से ही यह चलता से लगने लगता है ।

लेकिन हवा का झोंका ही था वह जो बड़ी बेपरवाही से उसे उड़ा कर ले गया था और कभी भी, किसी भी क्षण उसका रुख़ पलट जा सकता है । अहंकार की हवा, समय की हवा आख़िर कब तक साथ देती इस तिनके से शरीर का ।

कुछ ही देर में हवा पलटी और तिनके की बुलंदी का सपना टूट गया ।

और अब तिनका रूपी शरीर राह की धूल में मिल गया है । लेकिन कोई कोई संत आत्मज्ञान को पाकर कहते हैं कि आत्मज्ञान के पाते ही अहंकार जैसे ग़ायब हो जाता है और अब वह तिनका तिनके (ईश्वर के ) पास स्थित हो जाता है उसकी छाया मात्रा धूल में मिलती है । अहंकार के रहते हम छाया मात्र में जीते हैं और असल को छू भी नहीं पाते हैं ।