सांख्य योग- स्वधर्म कि यात्रा

जब कोई बच्चा पैदा होता है तब मनुष्य के रूप में अस्तित्व का पदार्पण होता है। बच्चा शुद्ध अस्तित्व रूप लिए होता है, रस रूप होता है। इसे बाउल गायकों नेआधार मानुषकहकर गीत लिखे हैं। धीरे धीरे बच्चा अपने शरीर से परिचित होता है। जिसे हम कहें कि जो रस है उसे पता चलता है कि रस के अलावा कुछ ठोस भी है जैसे रसगुल्ले का रस में डुबा होना लेकिन अभी सिर्फ गुल्ले से परिचय होता है। बचपन बीतते बीतते गुल्ले का संबंध रस से टूटकर, रस में डूबा हुआ नहीं समझते हुए से हटकर, स्वयं को रस युक्त गुल्ला, अर्थात् रसगुल्ला समझने लगता है। यहीं अहंकार का जन्म होता है, जब गुल्ला रस कि खासियत के अपनी खासियत समझने लगता है। अपने शरीर पर आरोपित कर लेता है।

संसार का जीवन जीते जीते, यदि मेडिटेशन या ध्यान से परिचय होकर कुछ मिनट इसका प्रयोग जारी रखा तो ही जीवन में, जब सहारे छूट जाते हैं और जीवन में कोई सार नहीं दिखाई देता, तब व्यक्ति सन्यास लेकर आध्यात्मिक मार्ग पर चल अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।

आंतरिक यात्रा का पहला पड़ाव ही उस गुल्ले द्वारा रस को गुल्ले कि विशेषता समझने के कारण जन्में अहंकार को समझकर वापस शून्य हो जाने देना है। करना नहीं है, नहीं तो (वहां ego )मौजूद है और बारीक रूप में, प्रयत्न करना भी आखिर कौन कर रहा है? के रूप में अहंकार ही है।

गुल्ला हो जाना है वापस, कि रस मेरा नहीं ईश्वर का है, मेरे माध्यम से प्रकट हो रहा है बस।यहां से आतर्यात्रा शुरू हुई समझो। ऐसा उन्होंने कहा जिन्होंने जाना। यह तभी आसान हो सकेगा जब सांसारिक जीवन में ध्यान का प्रयोग करते रहे, चाहे रूक रूक कर ही सही। ज्ञान कि प्राप्ति के लिए सभी उपलब्ध अवसरों का उपयोग करते रहे। और धार्मिक कट्टरता से दूर रहे। धर्म का उपयोग यदि धन कि प्राप्ति के लिए किया जा रहा है तो कट्टरता से बचने का उपाय मुश्किल होगा।

आंतरिक यात्रा यानी स्वधर्म और परिवार के कारण आरोपित धर्म में चुनाव स्पष्ट हो तभी यह संभव होगा। पारिवारिक धर्म कि अपनी उपयोगिता है, वह भी जरूरी है। लेकिन जब उसमें स्वार्थ निहित हो जाता है तो स्वधर्म यात्रा मात्र दिखावा बन जाती है। और यह स्वयं को धोखा देने समान है इसलिए ज्ञानीयों ने इस अवस्था को अज्ञानीयों से निम्नतर माना है। क्योंकि खुद को धोखे से बाहर करने का कोई उपाय ही नहीं है।

बाक़ी की यात्रा में सिर्फ एक कदम काफी है, और वह भी उठाना नहीं पड़ता बस वहीं के वहीं स्थिति रूपांतरण होना है, कि मैं गुल्ला नहीं हूं बल्कि रस ही हूं। रस ही गुल्ला बना हुआ है यह निश्चय पूर्वक याद आने से काम हो जाता है। यह सांख्य योग कि यात्रा कहलाती है, स्वयं को जानने कि, स्वधर्म कि, धर्म कि यात्राओं में।

जब ओशो से कोई बात करता है तो उसे ओशो में भी अपनी तरह के, कुछ विशेष रसगुल्ले ही नजरआ रहे हैं। और ओशो को उसका रसरूप पहले दिखाई देता है, बाद में रसगुल्ला जो वह हैजैसाकि वह अपने हाव भाव, आचरण और प्रश्न आदि से जाहिर कर रहा होता है निरंतरदिखाई देताहै। तो उसको उत्तर उसकी संभावनाओं, ग्रहणशीलता के आधार पर इस प्रकार का दिया जाता हैकि वह रसरूप होने कि यात्रा पर अगला कदम उठा सके।

ओशो में दोनों एक साथ उपस्थित हैं, जलती हुई माचिस कि तीली भी और उसका प्रतिबिंब, जैसातुमको दिखाई दे रहा हो वैसा, भी.

तुमको वह एक से दुसरे रूप, तुम्हारे स्वरूप, कि तरफ जाते देखते हैं तो जरूरी ज्ञान को उपदेश केमाध्यम से देते हैं।